गरीबी से जूझ रहे लोग अपने परिवार को चलाने के लिए पूरा दिन मेहनत और मजदूरी करके तब घर में पेट भर खाना खाते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है की उनकें सपने नहीं होते हैं। उनके भी सपने होते हैं लेकिन वह गरीबी के कारण परिवार के लिए सीमित कमाई के साथ ही दिल में ख्वाब लिए इस दुनिया से चल बसते हैं। दूसरी तरफ उनमें से कुछ ऐसे भी गरीब होते हैं जो तरक्की पाने के लिए वक्त से लड़ते हैं और बेहतरीन जिंदगी के लिए संघर्ष करते हैं  इसलिए कहा है “यदि आपका वर्तमान समय खराब चल रहा है तो मायूस ना हो बल्कि भगवान पर विश्वास रखें और मेहनत करते रहे हैं , आने वाला भविष्य आपका इसी खराब वर्तमान समय के कारण रौशन होगा “( कुलसूम फात्मा )

 

 

गरीब इंसान दिक्कतों और खराब परिस्थितियों को जितना महसूस कर सकता है उतना एक नॉर्मल इंसान नहीं। यही वजह है, की अधिकतर लोग समय की पड़ी मार के बाद वर्तमान से निकलने कर भविष्य को अच्छा बनाने के लिए हार ना मान कर उन्नति हासिल कर ही लेते हैं।
ऐसे इंसानों में एक आशाराम चौधरी भी हैं जिनके बारे में हम आपको बताएंगे। इनके पिता कचरा बीनते थे और अपने परिवार का खर्च उठाते परंतु किसी ने यह ना सोचा होगा ऐसे गरीब कचरा बीनने वाले इंसान का बेटा भी डॉक्टर बन सकता है। बता दे मध्य प्रदेश के देवास जिले में  आशाराम चौधरी का काम कचरा बीनना था। कार्य से आप आर्थिक स्थिति का पता लगा ही सकते हैं

 

 

भरपेट खाने के लिए बाप ने कराया था गवर्नमेंट स्कूल में एडमिशन –

खाने के लिए बाप ने गवर्नमेंट स्कूल में एडमिशन कराया था ,लेकिन बाप को कचरा चुनता देख बेटे ने एम्स की परीक्षा  उत्तीर्ण की पिता अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेज पाए। वह देखते  उनके पिता मेहनत मजदूरी करते तो कभी कुली का कार्य, हालात बहुत खराब चल रहे थे और जैसे-तैसे परिवार का पेट भर ही जाता था। कभी-कभी आशाराम चौधरी को भी अपने पिता के साथ काम करने के लिए जाना पड़ जाता था। क्योंकि घर में कभी कभी खाना खाने के लिए पैसे ना होते इसलिए उनके पिता को किसी ने कहा के सरकारी स्कूलों में पढ़ाई के साथ-साथ भोजन भी पेट भर मिलेगा। इस वजह से पिता ने बच्चों का एडमिशन सरकारी स्कूल में करा दिया। आशाराम पढ़ने में काफी अच्छा था। उन्होंने गांव के स्कूल से पांचवी तक पढ़ाई करी। वह काफी होशियार थे जिसके कारण अध्यापक भी उन्हें काफी मानते थे उन्होंने नवोदय विद्यालय में 12वीं तक पढ़ाई की।

 

पिता के दिनभर की ली कमाई जब डाक्टर ने तभी लिया निर्णय –

आशाराम को ना पता था भविष्य में क्या करना चाहिए वह फैसला नहीं कर पा रहे थे आखिर उन को भविष्य में क्या करना है। एक दिन उनकी अचानक से तबीयत खराब हुई उनके पिता डॉक्टर के पास गए तो डॉक्टर ने इलाज करने के लिए पिता से 50 रू फीस ली अब उस समय आशाराम यह सोच रहा था की उनके पिता की पूरे दिन की कमाई डॉक्टर ने ले ली तभी उन्होंने सोचा के वह डॉक्टर बनेंगे। किस्मत से परिवार का बीपीएल कार्ड बन गया था। इसलिए एडमिशन दक्षिण फाउंडेशन में सिलेक्शेन हुआ जिसका कार्य गरीब परिवार के बच्चों की सहायता करना है।

 

 

पहली बार में जब मिली सफलता तो डॉक्टर बनने की शुरू की तैयारी

18 साल की उम्र में आशाराम ने कड़ी मेहनत कर पढ़ाई की और एम्स का एग्जाम दिया जिसमें वह पहली ही परीक्षा में सफल हो गए। इस वक्त वह जोधपुर से एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहे हैं। आशाराम न्यूरोलॉजी में मास्टर ऑफ सर्जरी करके एक न्यूरो सर्जन बनना चाहते हैं उनकी तरक्की के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने मन की बात कार्यक्रम में तारीफ की, इसके साथ मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी उनकी तारीफ की और एम्स की फीस आशाराम से ना ली जाने की बात कही और 25 हजा़र के चेक के साथ परिवार को घर की सुविधा देने के लिए कहा।

 

आशाराम ने बताइए जब अपनी कहानी –

आशाराम ने बताया मेरा जीवन बहुत ही आर्थिक रूप से परेशानियों में गुजरा परंतु मैंने हार नहीं मानी और कड़ी मेहनत करी सपने भी देखे और ये सब मेरे पिता रणजीत चौधरी के कारण संभव हुआ मेरे पिता ने थैलियां खाली बोतलें और  रास्ते से कचरा चुन चुन कर घर का खर्चा चलाया और हमारा पेट भरा मुझे वह दिन याद है। मेरे दूसरे भाई बहनों की पढ़ाई भी मेरे पिता ने कराई।

उन्होंने खेतों में मजदूरी का भी काम किया, परंतु हिम्मत नहीं हारी और हम सब के लिए वह ताकत बने रहे। हमारे परिवार के पास कोई भी जमीन जायदाद वर्तमान समय में नहीं है।

विजयगंज मंडी नामक गांव में हमारा घास फूस से बना हुआ घर है। जिसे लोग झोपड़ी कहते हैं, उसमें शौचालय भी नहीं और बिजली का कनेक्शन भी नहीं है। एम्स के एडमिशन परीक्षा में ओबीसी वर्ग में मेरा सिलेक्शन हुआ। जिसमें मुझे 141वीं रैंक मिली। नीट में भी 6 मई को मुझे तरक्की मिल गई। नीट में मुझे ओबीसी श्रेणी में 803वीं रैंक मिली।

 

 

सम्भव हुआ क्योंकि मैं गरीब परिवार से था –

ये इसलिए सम्भव हुआ क्योंकि मैं गरीब परिवार से था और मैं अपने पिता को कूड़ा चुनता हुआ देखता और मेरा खून तरक्की पाने के लिए जोश मारता ,कि मैं अपने पिता के लिए कुछ कर सकूं। यह कहना गलत नहीं होगा हमारे हालात ऐसे थे जिसके कारण मैंने ख्वाब देखे और कहीं ना कहीं हमारा वर्तमान बहुत ही खराब चल रहा था जिससे मैंने भविष्य अच्छा करने की ठानी।

सीख ये मिलती है की वर्तमान यदि खराब है तो हार मानकर हाथ पर हाथ धरकर ना बैठे, जिंदगी में मेहनत करने से सब कुछ हासिल होता है और जुनून के साथ यदि लगे रहें हैं तो नामुमकिन है की जो आप चाहते हैं वह ना मिले।

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