#

पटना हाईकोर्ट प्रशासन ने एक नोटिस जारी कर 20 से 30 साल पुराने मामलों की सुनवाई हेतु संबंधित अधिवक्ताओं से फिजिकल सुनवाई के लिए सहमती मांगी है। आधिकारिक श्रोत के मुताबिक पटना हाईकोर्ट के समक्ष 30 साल से पुराने 2411 सिविल मामले लंबित हैं। वहीं उच्च न्यायालय के समक्ष 4663 ऐसे क्रिमिनल और सिविल मामले हैं जो 20-30 साल पुराने हैं। इतने पुराने मामलों के निष्पादन हेतु हाईकोर्ट की यह मत्वपूर्ण पहल है। 20 से 30 साल पुराने मामलों की सुनवाई हेतु हाईकोर्ट प्रशासन ने पक्षकार वकीलों से सहमती मांगी है। यदि वे इन मामलों की फिजिकल सुनवाई हेतु सहमत हैं तो उन्हें अपनी सहमती [email protected] वेबसाइट पर 17 सितंबर से पहले देनी होगी। सहमती प्राप्त होने के बाद हाईकोर्ट प्रशासन स्थितियों का आकलन कर इन मामलों को अलग-अलग पीठ के समक्ष सूचीबद्द करेगा।

 

 

एडवोकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष योगेश चन्द्र वर्मा ने दैनिक जागरण से खास बातचीत में बताया कि पुराने मामलों का निष्पादन जरूरी है मगर वर्तमान स्थितियों के मद्देनजर जामनत याचिका पर सुनवाई शीघ्र होनी चाहिए। जेल में बंद अभियुक्तों की जमानत नहीं हो पा रही है। अग्रिम जमानत के मामले एक साल से भी ज्यादा वक्त से सुनवाई के लिए लंबित हैं। पुलिस अभियुक्तों पर कुर्की-जब्ती का दवाब बना कर प्रताड़ित कर रही है। बेबस होकर लोगों को सुप्रीम कोर्ट का रुख करना पड़ रहा है। कोरोना काल इस बात की बिल्कुल भी इजाजत नहीं देता कि महत्वपूर्ण मामले जैसे जमानत याचिका, सिविल रिट जैसे मामलों को छोड़कर हाईकोर्ट पुराने मामलों की सुनवाई करे।

 

 

अधिवक्ता आरके शुक्ला ने बातचीत में बताया कि इतने पुराने मामलों में सहमती मांग कर सूचीबद्द करना कानून का मजाक बनाने जैसा है। उन्होंने अपनी राय में साफ कहा कि इन मामलों को सीधे-सीधे सूचीबद्ध कर निष्पादित कर देना चाहिए। इसके साथ-साथ वर्तमान मामलों के निष्पादन में तेजी लानी चाहिए। धीमी रफ्तार से सूचीबद्ध होने के कारण हजारो मामले निष्फल हो गए हैं, जिससे अधिवक्ता और उनके क्लाइंट दोनों निराश हैं।