हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले के रहने वाले हरबीर सिंह किसान परिवार से ताल्लुक रखते हैं। पॉलिटिकल साइंस से मास्टर्स की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने नौकरी के बजाय खेती को करियर बनाने का प्लान किया। वे पिता के साथ मिलकर पारंपरिक खेती करने लगे। हालांकि इसमें कुछ खास मुनाफा नहीं हो रहा था। इसके बाद हरबीर को नर्सरी लगाने का ख्याल आया। उन्होंने 2005 में थोड़ी सी जमीन से नर्सरी की शुरुआत की। आज 16 एकड़ जमीन पर उनकी नर्सरी है। हर साल 8 करोड़ बीज का वे प्रोडक्शन कर रहे हैं। मध्यप्रदेश, राजस्थान सहित देशभर में किसान उनसे बीजों की खरीद करते हैं। इतना ही नहीं, इटली भी उनकी नर्सरी से पौधे जाते हैं। इससे अच्छा-खासा मुनाफा भी वे कमा रहे हैं।

 

 

45 साल के हरबीर कहते हैं, शुरुआत में कुछ साल बीतने के बाद मुझे यह एहसास हो गया कि पारंपरिक खेती में बहुत अधिक आमदनी नहीं है। इसलिए कुछ नया करने का विचार कर रहा था। हिमाचल प्रदेश के एक व्यक्ति ने मेरे बगीचे में मधुमक्खी पालन का सेटअप लगाया था। मैंने उससे 6 बॉक्स लिए और खुद भी मधुमक्खी पालन करने लगा। बेहतर रिस्पॉन्स मिला तो मैंने दायरा बढ़ा दिया। कुछ दिन कॉमर्शियल लेवल पर भी काम किया। अभी मेरे पास 70 बॉक्स हैं। हालांकि अब इसे बिजनेस की जगह शौक से खुद के लिए करता हूं।हरबीर कहते हैं कि 15-16 साल पहले पौधों की खरीद के लिए पंजाब के एक नर्सरी वाले के पास गया था। वहां जाने पर पता चला कि बीज लेने से दो तीन महीने पहले उसकी बुकिंग करनी होती है। मुझे इस विषय में जानकारी नहीं थी और मैंने बुकिंग भी नहीं की थी। इसलिए मुझे वहां से खाली हाथ लौटा दिया गया। वे कहते हैं कि उस घटना के बाद मुझे काफी तकलीफ हुई। और तभी मैंने तय कर लिया कि इस नर्सरी से बड़ा खुद का सेटअप तैयार करूंगा।

 

 

घर लौटने के बाद हरबीर सिंह ने अपनी जमीन के थोड़े से हिस्से पर सीजनल सब्जियों के बीज के साथ नर्सरी की शुरुआत की। चूंकि वे इस फील्ड में नए थे और पहले से कोई ट्रेनिंग नहीं ली थी, इस वजह से शुरुआत के कुछ साल उन्हें घाटा भी उठाना पड़ा। कई बार पौधे सही तरह से तैयार नहीं हुए तो कई बार सही कीमत नहीं मिली।नर्सरी के बारे में जानकारी जुटाने के लिए हरबीर सिंह ने रिसर्च पर जोर दिया। उन्होंने कई मैगजीन और अखबारों में छपी रिपोर्ट्स को पढ़ा। कुछ किसानों से भी मिले। फिर उसके हिसाब से वे नया-नया प्रयोग करते गए। इससे धीरे-धीरे उनका प्रोडक्शन रेट बढ़ने लगा। आगे चलकर उन्होंने ड्रिप इरिगेशन सिस्टम लगाया। पौधों को तैयार करने के लिए पॉलीहाउस बनाया। इससे उनका दायरा बढ़ता गया। हरबीर कहते हैं कि मैंने दो चीजों पर सबसे ज्यादा फोकस किया। पहला जिस बैग में हम पौधे तैयार करते हैं और दूसरा वो मीडियम जिसकी मदद से पौधे ग्रोथ हासिल करते हैं।

 

 

आमतौर पर किसान बीज तैयार करने के लिए प्लास्टिक बैग का इस्तेमाल करते हैं। जबकि हरबीर प्लास्टिक की जगह कपड़े से तैयार किया हुआ बैग यूज करते हैं। वहीं मीडियम के रूप में वे धान की जली भूसी की राख, नदी का बालू और खाद के रूप में गोबर का इस्तेमाल करते हैं। हरबीर सिंह अभी दो तरीके से बीज तैयार कर रहे हैं। एक पॉलीहाउस के अंदर और दूसरा पॉलीहाउस के बाहर यानी खुले खेतों में। पॉलीहाउस के अंदर उन्होंने नर्सरी का सेटअप लगाया है। जहां वे मिट्टी की जगह धान की जली भूसी और नदी की रेत का इस्तेमाल करते हैं। जबकि खाद के लिए गोबर का यूज करते हैं। इन सभी को मिलाकर वे एक मिश्रण तैयार करते हैं। इसके बाद उसमें बीज लगाते हैं। सिंचाई के लिए उन्होंने ड्रिप इरिगेशन की व्यवस्था की है। 30 से 40 दिन के भीतर ये पौधे तैयार हो जाते हैं। इसमें वे कुकुरबीट्स वैराइटी की सब्जियों के बीज उगाते हैं।हरबीर सिंह कहते हैं कि हमारी क्वालिटी ही मार्केटिंग स्ट्रैटजी है। जो किसान एक बार बीज ले जाता है, दूसरी बार वो दूसरे किसानों को भी साथ लेकर आता है। सालभर में 8 करोड़ से ज्यादा बीज का प्रोडक्शन हरबीर सिंह करते हैं। इसमें सीजन के हिसाब से उगने वाली हर सब्जियों के बीज होते हैं।

 

 

हरबीर सिंह नर्सरी के साथ ही किसानों को ट्रेनिंग देने का भी काम करते हैं। उनके पास सैकड़ों किसान ट्रेनिंग के लिए आते हैं। कई स्कूल और कॉलेजों से भी उन्होंने टाईअप किया है। जिनके बच्चे उनके पास ट्रेनिंग के लिए आते हैं। करीब 100 लोगों को हरबीर सिंह ने अपने इस स्टार्टअप के जरिए रोजगार भी दिया है। इसमें ज्यादातर महिलाएं शामिल हैं। जो उनकी नर्सरी में पौधों की देखभाल करती हैं। नर्सरी का सेटअप बहुत हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस तरह के बीज और कौन से प्लांट के पौधे तैयार कर रहे हैं। कुछ बीजों की कीमत सामान्य होती है तो कुछ की बहुत ज्यादा। अगर कम बजट के साथ कोई किसान नर्सरी की शुरुआत करना चाहता है तो वह लाख-डेढ़ लाख से शुरुआत कर सकता है। इसमें वह सीजनल सब्जियों के बीज तैयार कर सकता है। मार्केट डेवलप होने के बाद किसान चाहे तो अपना दायरा बढ़ा सकता है। नर्सरी के बिजनेस में तीन से चार गुना तक कमाई हो जाती है। इस बिजनेस में किसानों के सामने सबसे अधिक मौसम और बारिश से पौधों को बचाने की चुनौती होती है। इसके लिए पौधों को प्लास्टिक से कवर किया जा सकता है।

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